गुरुवार, 11 अगस्त 2016

उत्तर भारतीय संगीत शिक्षण संस्थान गुरुकुल: एक संक्षिप्त विवेचन

भारतीय संगीत शिक्षा मूलतः गुरुकुल पद्धति पर ही आधारित है। गुरुकुल का अर्थ है- गुरु के गृह अथवा आश्रम में रहकर विद्योपार्जन करना।प्राचीनकाल में जिन विद्यार्थियों को संगीत शिक्षा ग्रहण करने की प्रबल इच्छा होती थी, वे (शिष्यगण) गुरू के आश्रम अथवा घर में उनके साथ रहकर कई वर्षों तक लगातार संगीत की शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही गुरू की सेवा तथा घर के समस्त कार्य करते थे। उस काल में शिक्षा प्रदान करने का दायित्व ऋषि-मुनियों का होता था। इसका उल्लेख हमें इतिहास व पुराणों से प्राप्त होता है।
वैदिक काल में सामगान का अत्यन्त व्यवस्थित् रूप आैर उसके विधि-विधान का पर्याप्त प्रसार होने के कारण धीरे-धीरे विशिष्ट प्रशिक्षण की दृष्टि से प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में गुरूकुल अथवा गुरू आश्रमों का निर्माण होने लगा। इन्हीं आश्रमों में सामवेद का प्रशिक्षण मौखिक रूप से ही दिया जाता था। इसलिए वेद को अनुश्रव भी कहा गया। यथा-
"गुरूमुखादनुश्रुयतेइत्यनुश्रवो वेदः"
संगीत शिक्षा के सन्दर्भ में यही पद्धति 'गुरू शिष्य प्रणाली'  अथवा 'परम्परा' के रूप में पहचानी जाती है। जिसके अतर्गत गुरू का शिष्य को विद्यादान देना और शिष्य द्वारा उसमें पारंगतता हासिल करना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। इसके विकास क्रम में शिष्य ही गुरू बन जाता था तथा उनके भी अनेक शिष्य प्रशिष्य तैयार होते रहते थे।
उस काल में गुरू शिष्य की अनुसंधान प्रतिभा, धैर्य, ब्रह्मचर्य तथा गुरु सेवा से सन्तुष्ट होकर ही शिष्य को उपयुक्त विद्या प्रदान करते थे।
श्रीमद्भगवद् गीता से उद्धृत:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन:।।134।। अध्याय-4
अर्थात्, तुम गुरू के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो। उससे विनीत होकर जिज्ञासा प्रकट करो और उनकी सेवा करो। स्वरूप सिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।
इस प्रकार वैदिक काल में ही संगीत शिक्षा का आधार गुरू शिष्य परम्परा प्रमुख रहा। शिष्य को गुरू के साहचर्य में रहकर सच्चरित्र तथा एकाग्रचित्त होकर विद्याध्ययन करना विशेष था। उस समय तीव्रता, लगन तथा गुरू निष्ठा इत्यादि गुणों की कसौटी पर खरा उतरने के पश्चात तथा गुरू की आज्ञा का पूर्ण पालन करने के उपरान्त ही शिष्य को गुरू कृपा तथा विद्या प्राप्त होती थी।
विद्यार्थी राजपुत्र हो या सामान्यपौरजन् अर्थात् नागरिक, आश्रम में विद्यार्थी होने के नाते सभी का स्तर समान ही माना जाता था। विद्योपार्जन हेतु उन्हें कठिन परिश्रम करना पडता था। फलतः समाज में उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पडता था। गुरुकुल प्रणाली में भी एक कक्षा में अधिक विद्यार्थी न होने के कारण प्रत्येक विद्यार्थी पर गुरु ध्यान दे पाता था। इस कठिन मार्ग को पार करने के पश्चात् ही वे स्वयं की आजीविका चला सकते थे।
इस परम्परा में कई वर्षों तक निरन्तर साथ रहने के कारण गुरू एवं शिष्य में पारस्परिक श्रद्धा, आत्मीयता, निर्भरता एवं प्रेम का विकास हो जाता था। साथ ही गुरू का शिष्य के प्रति अभिभावकीय दृष्टिकोण एवं शिष्य की श्रद्धा तथा भक्ति का एक ऐसा मार्ग तैयार करते थे जिससे यह सूक्ष्म ज्ञान नई पीढी को स्थानान्तरित किया जा सकता था।
       वैदिक साहित्य में गुरूकुल के अन्तर्गत साम संगीत के क्रियात्मक एवं शास्त्रात्मक दोनों ही प्रकार के प्रशिक्षण के संकेत मिलते हैं।
       इस प्रकार प्राचीन काल में संगीत के साथ-साथ शास्त्रात्मक ज्ञान को भी पर्याप्त महत्व दिया गया।
       शास्र का ज्ञाता, क्रियात्मक रूप से उस पर विचार करने वाला, गुरु सानिध्य में संगीत सीखने के फलस्वरूप दोनों की सुनियोजित वयवस्था करने वाला व्यक्ति ही योग्य शिक्षक माना गया है। गुरू के समान ही विद्या की परिपक्वता के उद्देश्य से विद्यार्थी की चार अवस्थाएँ बताई गई हैं- आगम, स्वाध्याय, प्रवचन व व्यवहार। विद्यार्जन के पश्चात पाठ्य सामग्री का स्वाध्याय; त्पश्चात् अध्यापन करने से विद्या में कई गुना वृद्धि हो जाती है तथा आर्जित विद्या के प्रकीर्तित होने पर वह प्रयोग की दृष्टि से क्रियाशील हो जाती है।
       गुरू ऋण से मुक्त होने के लिए ही क्षिक्षण कार्य नि:शुल्क किया जाता था। शिक्षा समाप्ति पर गुरु दक्षिणा के रूप में शिष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ भी दे सकता था। शिक्षा समाप्ति पर विद्यार्थी को विद्वानों की सभा में उपस्थित किया जाता था जहाँ उसे विद्वानों द्बारा किये गये प्रश्नों के उत्तर देने होते थे। इस प्रकार वह विद्यार्थी बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न होता था। शिक्षा समाप्ति के पश्चात् समावर्तन संस्कार (आधुनिक दीक्षांत समारोह) होता था। जिनमें योग्य विद्यार्थी को नवीन वस्त्र, आभूषण, पगडी, छाता इत्यादि उपहार स्वरूप दिया जाता था तथा एक विशेष यज्ञानुष्ठानादि का आयोजन करके कुल-देवता व गुरू की पूजा के उपरान्त स्नातक विद्या दान का व्रत लेता था। इस समय गुरू शिष्य को जो आन्तिम उपदेश देते थे, उसे समावर्तन उपदेश कहा जाता था।
       संगीत विद्या का आदान प्रदान जो प्राचीनकाल में गुरू शिष्य परम्परा के द्वारा सम्पन्न होता था, कालानुक्रम व परिस्थिति के अनुसार इसमें परिवर्तन आना स्वाभाविक ही रहा और मध्यकाल में गुरूकुल एवं आश्रमों के स्थान पर संगीत की शिक्षा राजमहलों में दी जाने लगी।
       संगीत शिक्षण की ये परम्परा मुगलकाल में अविरल रूप से चलती रही। 18 वीं शती के उत्तरार्ध में संगीत साधना साधारण रूप से चलती रही साथ ही विदेशी शासन का प्रभाव भी शिक्षण व्यवस्था पर पडने लगा।
       स्वाधीनता के उपरान्त लोगों में सांस्कृतिक विकास के प्रति एक प्रकार की जागरूकता उत्पन्न हुई। सरकार एवं शिक्षाविदों के प्रयास से संगीत विषय को माध्यमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रम में महत्व प्राप्त हुआ। शनै: शनै: संगीत विषय उच्चतर माध्यमिक व स्नातकोत्तरीय कक्षाओं में भी पढाया जाने लगा।
          वतर्मान में स्थापित गुरूकुल संस्था
यद्यपि प्राचीन समय में विद्यमान गुरूकुल समय के परिवर्तन के साथ ही शिक्षण संस्थाओं का रूप धारण कर लिया है, जहाँ अनेक विद्यार्थी एक स्थान पर एकत्रित होकर अनेक विषयों का विद्याध्ययन करते हैं तथापि संगीत शिक्षण का होना कुछ हद तक ठीक प्रतीत होता है, क्योंकि संगीत गुरूमुखी विद्या है जो गुरू के सानिध्य में ही रहकर प्राप्त हो सकती है। संगीत की दिशा और गति को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से होनहार, प्रतिभावान छात्रों को छात्रवृति व उन्हें सुयोग्य  गुरुओं से सीखने का अवसर प्रदान कर भारत सरकार एक ओर उनके उज्जवल भाविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रही है तो दूसरी ओर फैलोशिप आदि के माध्यम से शोध की प्रक्रिया को बढावा देने का। इस हेतु आज वर्तमान में कई संगीतज्ञ व कलाकारों ने संगीत शिक्षण हेतु प्राचीन पद्धति के अनुसार 'गुरूकुल आश्रम' खोले हैं। साथ ही 'स्पिक मैके' जैसी संस्था ने 'गुरुकुल अनुभव छात्रवृत्ति' की भी घोषणा की है, जिसके अर्न्तगत प्रतिवर्ष विशिष्ट परीक्षा द्वारा कुछ चुने हुए विद्यार्थीयों को बिना किसी शुल्क के बडे उस्ताद/गुरू के पास कुछ समय (लगभग कम से कम एक मास) के लिए भेजा जाता है। जहाँ विद्यार्थी उतने समय गुरू के पास रहकर संगीत की उन विशिष्ट बातों व तथ्यों की जानकारी प्राप्त करता है साथ ही गुरूकुल का भी आनन्द प्राप्त करता है।
       इसी प्रकार 'संस्कृति मंत्रालय' ने भी फेलोशिप की घोषणा की है जिसमें चुनिन्दा विद्यार्थियों को दो वर्ष अथवा पाँच वर्ष गुरू के सानिध्य में रहकर संगीत सीखने का अवसर प्राप्त होता है।
मेरे विचार से विश्वविद्यालय स्तर पर प्रायोगिक शिक्षा अथवा क्रियात्मक संगीत व्यवस्था गुरूकुल पद्धति से दी जाये। चार-पाँच संगीत विद्यालय अथवा विश्वविद्यालय मिलाकर एक गुरूकुल बनाये जायें। पाँच वर्षों के पश्चात ही विद्यार्थियों से परिणाम की आशा रखी जाये। साथ ही उपलब्ध वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से भी विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
इस प्रकार वर्तमान में कई बडे उस्ताद व गुरु संस्थागत शिक्षण पद्धति की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए गुरूकुल पद्धति से ही संगीत शिक्षण प्रदान कर रहे हैं तथा उनके इस कार्य में संस्कृति विभाग व भारत सरकार का बहुत ही सराहनीय योगदान रहा है। अनेक निजी संस्थाएं भी गुरूकुल पद्धति से शिक्षण प्रदान करने की कोशिश कर रही है।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि गुरू शिष्य परम्परा ही संगीत शिक्षा का आधार रहा है। आज भी कुछ शिक्षण संस्थान हैं जैसे संगीत रिसर्च अकादमी, नेशनल सेन्टर फार द परफार्मिंग आर्ट आदि, जो उसी प्रकार का वातावरण बनाने में प्रयासरत् हैं। साहित्य कला परिषद, संगीत नाटक अकादमी और भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद जैसी संस्थाएँ नवोदित और प्रतिष्ठित कलाकारों को मंच प्रदान करती है।
गुरूकुल में विद्यार्थी गुरु के सानिध्य में रहता है तथा उनकी देख रेख में संगीत विद्या ग्रहण करता है। शिक्षा की भिन्न मिन्न शाखाएं मनुष्य का तीन प्रकार से विकास करती है- शारीरिक, बौद्विक और आत्मिक। आत्मिक विकास से सम्बन्धित विषयों में गुरु एवं शिष्य के बीच व्यक्तिगत् सम्बन्धों का बहुत अधिक महत्व है तथा संगीत को वैदिक काल से ही आत्मिक विकास के साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। इसका स्वरूप पूर्णतः क्रियात्मक होने के कारण सामूहिक शिक्षा की अपेक्षा व्याक्तिगत् शिक्षा के माध्यम से ही श्रेष्ठतम् परिणाम प्रस्तुत किये जा सकते हैं। साथ ही प्राचीन गुरू शिष्य परम्परा पर आधारित शिक्षा से मंच प्रदर्शन में समर्थ कलाकारो का निर्माण हो पा रहा है। समय की माँग को देखते हुए आज आवश्यकता है कि गुरू शिष्य परम्परा के उच्च आदर्शों को संगीत संस्थान गुरुकुल में स्थापित करने के लिए घरानेदार की गरिमा को अक्षुण्य बनाये रखने के प्रयास किये जायें जिससे शास्त्रीय संगीत का भविष्य उज्जवल हो सके।
   यह प्रयास संगीत गुरूकुल हेतु अच्छा संकेत है। जहाँ प्राचीन गुरूकुल पद्धति के अनुसार संगीत विद्या गुरू द्वारा प्रदान की जाती है, जिससे विद्यार्थी की बौद्धिक, साहित्यिक, सामाजिक व प्रत्येक क्षेत्र से जुडी असीमित क्षमता से परिपूर्ण हो सके।
          सन्दर्भ सूची
1. सक्सेना मधुबाला, भारतीय संगीत शिक्षण प्रणाली व उसका वर्तमान स्तर
2. श्रीमद्भगवत्गीता
3. शर्मा राधिका, भारतीय संगीत को मीडिया और संस्थानों का योगदान
4. विभिन्न पत्र पत्रिकाएँ
5. कई विद्वानेां से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी के अनुसार.

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