शनिवार, 23 जुलाई 2016

Dhrupad : Its Nature and practice


Dhrupad as we know it today is performed by a solo singer or a small number of singers in unison to the beat of the pakhavaj or mridang rather than the tabla. The vocalist is usually accompanied by two tanpuras, the players sitting close behind, with the percussionist at the right of the vocalist. Traditionally the only other instrument used was the Rudra Veena. Some artists have used other instruments. Preferably, such instruments should have a deep bass register and long sustain.
Like all Indian classical music, dhrupad is modal and monophonic, with a single melodic line and no chord progression. Each raga has a modal frame – a wealth of micro-tonal ornamentations (gamaka) are typical.
The text is preceded by a wholly improvised section, the alap. The alap in dhrupad is sung using a set of syllables, popularly thought to be derived from a mantra, in a recurrent, set pattern: a re ne na, té te re ne na, ri re re ne na, te ne toom ne (this last group is used in the end of a long phrase). Dhrupad styles have long elaborate alaps, their slow and deliberate melodic development gradually bringing an accelerating rhythmic pulse. In most styles of dhrupad singing it can easily last an hour, broadly subdivided into the alap proper (unmetered), the jor (with steady rhythm) and the jhala (accelerating strumming) or nomtom, when syllables are sung at a very rapid pace. Then the composition is sung to the rhythmic accompaniment: the four lines, in serial order, are termed sthayi, antara, sanchari and aabhog.
Compositions exist in the metres (tala) tivra (7 beats), sul (10 beats) and chau (12 beats) – a composition set to the 10-beat jhap tala is called a sadra while one set to the 14-beat dhamar is called a dhamar. The latter is seen as a lighter musical form, associated with the Holi spring festival.
Alongside concert performance the practice of singing dhrupad in temples continues, though only a small number of recordings have been made. It bears little resemblance to concert dhrupad: there is very little or no alap; percussion such as bells and finger cymbals, not used in the classical setting, are used here, and the drum used is a smaller, older variant called mrdang, quite similar to the mridangam.

ब्रजभाषा का जीवन पर प्रभाव


       ब्रजभाषा मूलत: ब्रजक्षेत्र की बोली है। (श्रीमद्भागवत के रचनाकाल में “व्रज” शब्द क्षेत्रवाची हो गया था। विक्रम की 13वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक भारत के मध्य देश की साहित्यिक भाषा रहने के कारण ब्रज की इस जनपदीय बोली ने अपने उत्थान एवं विकास के साथ आदरार्थ “भाषा” नाम प्राप्त किया और “ब्रजबोली” नाम से नहीं, अपितु “ब्रजभाषा” नाम से विख्यात हुई। अपने विशुद्ध रूप में यह आज भी आगरा, धौलपुर, मथुरा और अलीगढ़ जिलों में बोली जाती है। इसे हम “केंद्रीय ब्रजभाषा” के नाम से भी पुकार सकते हैं।
       ब्रजभाषा में ही प्रारम्भ में काव्य की रचना हुई। सभी भक्त कवियों ने अपनी रचनाएं इसी भाषा में लिखी हैं जिनमें प्रमुख हैं सूरदास, रहीम, रसखान, केशव, घनानंद, बिहारी, इत्यादि। हिन्दी फिल्मों के गीतों में भी बृज के शब्दों का प्रमुखता से प्रयोग किया गया है।

ब्रजभाषा स्वरूप

       जनपदीय जीवन के प्रभाव से ब्रजभाषा के कई रूप हमें दृष्टिगोचर होते हैं। किंतु थोड़े से अंतर के साथ उनमें एकरूपता की स्पष्ट झलक हमें देखने को मिलती है।
       ब्रजभाषा की अपनी रूपगत प्रकृति कारांत है अर्थात् इसकी एकवचनीय पुंलिंग संज्ञाएँ तथा विशेषण प्राय: औकारांत होते हैं; जैसे खुरपौ, यामरौ, माँझौ आदि संज्ञा शब्द औकारांत हैं। इसी प्रकार कारौ, गोरौ, साँवरौ आदि विशेषण पद औकारांत है। क्रिया का सामान्य भूतकालिक एकवचन पुंलिंग रूप भी ब्रजभाषा में प्रमुखरूपेण औकारांत ही रहता है। यह बात अलग है कि उसके कुछ क्षेत्रों में “य्” श्रुति का आगम भी पाया जाता है। जिला अलीगढ़ की तहसील कोल की बोली में सामान्य भूतकालीन रूप “य्” श्रुति से रहित मिलता है, लेकिन जिला मथुरा तथा दक्षिणी बुलंदशहर की तहसीलों में “य्” श्रुति अवश्य पाई जाती है। जैसे :
“”कारौ छोरा बोलौ”” -(कोल, जिला अलीगढ़)।
“”कारौ छोरा बोल्यौ”” -(माट जिला मथुरा)।
“”कारौ लौंडा बोल्यौ”” -(बरन, जिला बुलंदशहर)।
       कन्नौजी की अपनी प्रकृति ओकारांत है। संज्ञा, विशेषण तथा क्रिया के रूपों में ब्रजभाषा जहाँ औकारांतता लेकर चलती है वहाँ कन्नौजी ओकारांतता का अनुसरण करती है। जिला अलीगढ़ की जलपदीय ब्रजभाषा में यदि हम कहें कि- “”कारौ छोरा बोलौ”” (= काला लड़का बोला) तो इसे ही कन्नौजी में कहेंगे कि-“”कारो लरिका बोलो। भविष्यत्कालीन क्रिया कन्नौजी में तिङं्तरूपिणी होती है, लेकिन ब्रजभाषा में वह कृदंतरूपिणी पाई जाती है। यदि हम “लड़का जाएगा” और “लड़की जाएगी” वाक्यों को कन्नौजी तथा ब्रजभाषा में रूपांतरित करके बोलें तो निम्नांकित रूप प्रदान करेंगे :
कन्नौजी में – (1) लरिका जइहै। (2) बिटिया जइहै।
ब्रजभाषा में – (1) छोरा जाइगौ। (2) छोरी जाइगी।
       उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ब्रजभाषा के सामान्य भविष्यत् काल रूप में क्रिया कर्ता के लिंग के अनुसार परिवर्तित होती है, जब कि कन्नौजी में एक रूप रहती है।
       इसके अतिरिक्त कन्नौजी में अवधी की भाँति विवृति (Hiatus) की प्रवृत्ति भी पाई जाती है जिसका ब्रजभाषा में अभाव है। कन्नौजी के संज्ञा, सर्वनाम आदि वाक्यपदों में संधिराहित्य प्राय: मिलता है, किंतु ब्रजभाषा में वे पद संधिगत अवस्था में मिलते हैं। उदाहरण :
(1) कन्नौजी -“”बउ गओ”” (= वह गया)।
(2) ब्रजभाषा -“”बो गयौ”” (= वह गया)।
       उपर्युक्त वाक्यों के सर्वनाम पद “बउ” तथा “बो” में संधिराहित्य तथा संधि की अवस्थाएँ दोनों भाषाओं की प्रकृतियों को स्पष्ट करती हैं।
       ब्रजभाषा क्षेत्र की भाषागत विभिन्नता को दृष्टि में रखते हुए हम उसका विभाजन निम्नांकित रूप में कर सकते हैं :
(1) केंद्रीय ब्रज अर्थात् आदर्श ब्रजभाषा – अलीगढ़, मथुरा तथा पश्चिमी आगरे की ब्रजभाषा को “आदर्श ब्रजभाषा” नाम दिया जा सकता है।
(2) बुदेली प्रभावित ब्रजभाषा – ग्वालियर के उत्तर पश्चिम में बोली जानेवाली भाषा को यह नाम प्रदान किया जा सकता है।
(3) राजस्थान की जयपुरी से प्रभावित ब्रजभाषा – यह भरतपुर तथा उसके दक्षिणी भाग में बोली जाती है।
(4) सिकरवाड़ी ब्रजभाषा – ब्रजभाषा का यह रूप ग्वालियर के उत्तर पूर्व के अंचल में प्रचलित है जहाँ सिकरवाड़ राजपूतों की बस्तियाँ पाई जाती हैं।
(5) जादोबाटी ब्रजभाषा – करौली के क्षेत्र तथा चंबल नदी के मैदान में बोली जानेवाली ब्रजभाषा को “जादौबारी” नाम से पुकारा गया है। यहाँ जादौ (यादव) राजपूतों की बस्तियाँ हैं।
(6) कन्नौजी से प्रभावित ब्रजभाषा – जिला एटा तथा तहसील अनूपशहर एवं अतरौली की भाषा कन्नौजी से प्रभावित है।

क्षेत्र विभाजन

       ब्रजभाषी क्षेत्र की जनपदीय ब्रजभाषा का रूप पश्चिम से पूर्व की ओर कैसा होता चला गया है, इसके लिए निम्नांकित उदाहरण द्रष्टव्य हैं :
जिला गुड़गाँवा में – “”तमासो देख्ने कू गए। आपस् मैं झग्रो हो रह्यौ हो। तब गानो बंद हो गयो।””
जिला बुलंदशहर में -“”लौंडा गॉम् कू आयौ और बहू सू बोल्यौ कै मैं नौक्री कू जाङ्गौ।””
जिला अलीगढ़ में – “”छोरा गाँम् कूँ आयौ औरु बऊ ते बोलौ (बोल्यौ) कै मैं नौक्री कूँ जाङ्गो।””
जिला एटा में – “”छोरा गॉम् कूँ आओ और बऊ ते बोलो कै मैं नौक्री कूँ जाउँगो।””
इसी प्रकार उत्तर से दक्षिण की ओर का परिवर्तन द्रष्टव्य है-
जिला अलीगढ़ में -“”गु छोरा मेरे घर् ते चलौ गयौ।””
जिला मथुरा में -“”बु छोरा मेरे घर् तैं चल्यौ गयौ।””
जिला आगरा में -“”मुक्तौ रुपइया अप्नी बइयरि कूँ भेजि दयौ।””
ग्वालियर (पश्चिमी भाग) में – “बानैं एक् बोकरा पाल लओ। तब बौ आनंद सै रैबे लगो।”

सूफी संगीत का भारतीय संगीत पर प्रभाव


         आदिकाल से ही रहस्यवाद इंसान की हार्दिक आंतरिक तलाश और सर्वशक्तिमान से सीधा सम्पर्क स्थापित करने का साधन रहा है। संसार के सभी धर्माें, क्षेत्रों और भाषाओं में इसे प्रकट किया गया है। इसीलिए कहा जाता है कि इसकी कोई वंशावली नहीं है, शब्द ‘अहसन’ और ‘भक्ति’ दोनों में ही सर्वशक्तिमान से प्रेम करने की कल्पना मूलरूप से एक ही है इस सर्वशक्तिमान से प्रेम की कल्पना में डूबे हुए सूफियों, ने कैसे संगीत के माध्यम से भारत के दोनों की समुदायों में सामंजस्य व भाईचारे की भावना का विकास किया, कैसे तात्कालीन सूफी सांगीतिक तत्वों को हिन्दुस्तानी संगीत परम्परा ने आत्मसात् किया, तथा क्या इसके अंश वर्तमान समय के संगीत में देखे जा सकते हैं आदि ऐसे प्रश्नों को हमने अपने शोधपत्र का आधार बनाया है।
         प्रत्येक धर्म के दो पहलू होते हैं, एक आन्तरिक और एक बाह्य इसी प्रकार इस्लामिक धर्म के बाह्य रूप में उसका सम्बन्ध उसके रीति रिवाजों से होता है जबकि आन्तरिक रूप से उसका सम्बन्ध धर्म के रहस्यवाद आध्यात्मवाद से होता है जिसे ‘‘तसव्वुफ’’ कहा जाता है जो ‘‘सूफी’’ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अरबी शब्द माना जाता है और इसी ‘‘तसव्वुफ’’ में विश्वास रखने वाले सूफी कहे जाते हैं। सूफियों के कई सिलसिले प्रचलित थे। आइने अकबरी में अबुल-फज़ल ने 14 सूफी सिलसिलों का विवरण दिया है किन्तु इसमें 4 ही ऐसे सिलसिले हैं जिनका भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इनमें चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी और नक्शबन्दी मुख्य हैं।
         सूफियों द्वारा प्रयुक्त संगीत को ‘‘समा’’ कहा जाता है। समा अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है पढ़ना, गाना। आरम्भ में सूफी एक जगह जमा हो जाते थे तथा सामूहिक रूप से ईश्वर के नामों का जाप करते थे जब ये जाप करते थे तो उसमें एक प्रकार के संगीत की लय निकालती थी। जिसे ‘‘समा’’ कहा जाता था। सूफियों का मानना था कि जब वे समा करते हैं तो उससे एक प्रकार के आनन्द की अभिव्यक्ति होती है तथा ईश्वर के प्रेम की ज्वाला हृदय में भड़कती है तब लोग भावोद्रेक के कारण अचेत हो जाते हैं झूमते-2 गिर जाते हैं उन्हें हाल आ जाता है। सारांशतः वे समा की पराकाष्ठा पर पहुँचकर सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन हुआ, हजरत मोहम्मद साहब की प्रशंसा में गीत गाये जाने लगे और सामूहिक नृत्य भी होने लगे और कुछ वाद्यों का भी उपयोग होने लगा जिसके कारण धर्माचार्यों द्वारा इसकी बहुत आलोचना होने लगी। किन्तु वास्तव में इस्लाम में कहीं भी संगीत को त्याज्य नहीं माना गया है।
         वास्तव में इस्लाम में भी ‘समा’ की सत्ता किसी न किसी रूप में बनी रही और अवसर आने पर अनेक बार सूफियों में फूट भी पड़ी सू  फी परम्परा के भावधारा का आधार प्रेम हैं जिसे इश्क की संज्ञा से अभिहित किया गया है इश्क मिजाजी से इश्क हकीकी तक पहुँचने का सूफी परम्परा अनुमोदन करती है। प्रेम का मूल है श्रृंगार रस और श्रृंगार रस की अभिव्यंजना के लिए संगीत से सशक्त माध्यम और कोई नहीं हो सकता। परिणामतः सूफी संतों ने अपने आदर्शों, सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार हेतु संगीत को माध्यम के रूप में चुना, संगीत ही वास्तव में ऐसा साधन था जो परस्पर प्रत्येक समुदाय को निकट लाने व प्रेम सौहार्द की भावना में बांधे रख सकता था सम्भवतः यही कारण था कि सूफियों ने तात्कालीन संगीत के कई तत्वों को आत्मसात कर दोनों ही संस्कृतियों के सम्मिश्रण से निर्मित एक नवीन ‘‘सूफीयाना संगीत’’ को जन्म दिया।
         इस प्रकार ‘‘समा’’ में गाये जाने वाली गायन शैलियाँ यद्यपि तात्कालीन गायन के मूल प्राण प्रबंध गायन प्रणाली को नहीं समझ सके तथापि भारतीय संगीत की स्वरावलियों ने उन्हें आकर्षित किया। इसी कारण उन्होंने अरबी, फारसी दोनों का सम्मिश्रण कर कौल, कल्बाना, नक्श-गुल, कव्वाली, गज़ल तराना आदि गायन विधाओं का चित्रण किया।
         ‘कव्वाली’ के उत्पत्ति व विकास के सन्दर्भ में डाॅ0 रामशर्मा का मत है कि कव्वाली की मुख्य विशेषता अरबी-फारसी, ईरानी-भारतीय संगीत का सम्मिश्रण है’’ परमात्मा की प्रशंसा या उसकी शान में गाना अथवा विरहावस्था में उसका स्मरण करना कव्वाली के माध्यम से सम्पन्न होता है। कव्वाली सूफीयाना संगीत की विशेष गायकी है जिसका मूलरूप आध्यात्म को स्पर्श करता है यह समा का ही रूप है। कव्वाली में सूफी दर्शन, खुदारसूल की तारीफ, वसूदों शरीफ द्वारा मालिक से इल्तजा, हुस्नों इश्क की रंगीनियत भरी शोखी, जश्न व महफिलों के मसले आदि शामिल होते हैं सूफियों की यह विशेष गायकी भारतीय संगीत में स्वीकारणीय हो गई है तथा वर्तमान समय में यह भक्ति संगीत, सुगम संगीत, चित्रपट संगीत आदि सभी क्षेत्रों में एक स्वतंत्र विधा के रूप में सम्मानित है।
         सूफी संगीत में ‘‘कौल’’ विधा महत्वपूर्ण जो अरबी भाषा का शब्द है इसका अर्थ कथन, वचन, प्रवचन होता है। कौल में गम्भीर रागों के टुकड़े लिये जाते हैं इसीप्रकार नक्शगुल व नक्श-निगार भी वर्तमान समय में मौसम बहार तथा मल्हार ऋतु में गाये जाते हैं।
         ‘धमार’ उस गाने का नाम है जो सूफियों की महफिल में गाया जाता है जब सूफियाएं कराम खड़े होकर एक दूसरे का हाथ पकड़कर और वृत्त बनाकर नृत्य करते व सबके पांव कव्वाल के इस गाने के वजन पर उठते और बढ़ते हैं साथ ही इसके जो ताल बजायी जाती वो ‘धमार’ ताल में बंधी होती थी जिसे आधुनिक काल में ‘धमार’ कहा जाता है।
         उपरोक्त गायन शैलियों के साथ-2 अन्य विधायें जैसे तराना, ठुमरी भी हिन्दुस्तानी संगीत गायकी में सूफी परम्परा के तत्व दिखाती है तराना गायकी में यद्यपि निरर्थक शब्द होते हैं तथापि सूफियों ने उसमें फारसी शायरी जोड़कर उसे भी एक सार्थक आयाम दिया। आगे चलकर अनेक सार्थक शब्दों से युक्त तराने गीत लिखने का भी प्रयास किया गया जो सूफी परम्परा से पूर्ण प्रभावित हैं। स्व0 उस्ताद अमीर खाँ ने शोध द्वारा तराने के शब्दों का अर्थ निकालने का प्रयास किया है जैसे- यली- या इलाही, यला-या अल्लाह।
         ठुमरी गायकी वियोग अथवा विप्रलम्भ श्रृंगार से ओत प्रोत हैं इसमें भावों का विशेष महत्व होता है जिस प्रकार जीवात्मा परमात्मा के वियोग में व्याकुल होती है यह विरहावस्था सामान्य होकर भी विशिष्ट व सूफीयाना होती है। जब भक्त को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती तो वह व्याकुल होकर गाता है सूफियों की खानकाहों में मुखरित होने वाला संगीत में भी यही व्याकुलता झलकती है ऐसे उदाहरण है जिनमें नायिका (भक्त) नायक (ईश्वर) से मिलने के लिए तत्पर व व्याकुल है।
1. बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय
2. सैया बिना घर सूना, सूना।
         निर्गुण निराकार ईश्वर प्रेम को प्राप्त कर लेने की अभिलाषा सभी धर्मों को वर्तमान समय में भी उनके प्रति आकृष्ट करती है। संगीत व ईश्वरीय आस्था का सुन्दर सम्मिश्रण बहुत कम देखने को मिलता है।
         इस प्रकार सूफी परम्परा से भारतीय संगीत को अनेक अनमोल रत्न प्राप्त हुए। सूफीयों ने तराने को जहाँ सार्थक आयाम दिया तो कव्वाली जैसी अनूठी गायनशैली का प्रभाव हिन्दुस्तानी भक्ति संगीत कीर्तन व सत्संग पर भी प्रभाव पड़ा। सूफीयों की परम्परा लोक गीतों पर आधारित थी इसी कारण पंजाब के लोकगीतों में विशेषतः सूफीयाना मनोवृत्ति के गीतों का अस्तित्व मिलता है। इसके अतिरिक्त राम-सीता की खोज में विलाप करते वन-वन भटकना, कृष्ण के विरह में गोपियों का व्याकुल होना आदि अनेक स्थानों पर हमें सूफी दर्शन की मान्यता ही झलकती है। वस्तुतः भारतीय पौराणिक वाङ्मय से सूफी काफी प्रभावित थे। इसी कारण उनके संगीत में भारतीयता व भारतीय दर्शन का पुट मिलना अस्वाभाविक नहीं है इसीलिए भारतीय लोक जीवन में सूफी संगीत के प्रति इतना रुझान देखने को मिलता है। इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किस सीमा तक सूफी संगीत ने भारतीय संगीत को प्रभावित किया।